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श्री गरुड़ पुराण एकादश अध्याय

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  श्री गरुड़ पुराण एकादश अध्याय   दशगात्र – विधान गरुड़ उवाच गरुड़ जी बोले – हे केशव ! आप दशगात्र विधि के संबंध में बताइए, इसके करने से कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है और पुत्र के अभाव में इसको किसे करना चाहिए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले – हे तार्क्ष्य ! अब मैं दशगात्रविधि को तुमसे कहता हूँ, जिसको धारण करने से सत्पुत्र पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। पुत्र (पिता के मरने पर) शोक का परित्याग करके धैर्य धारण कर सात्विक भाव से समन्वित होकर पिता का पिण्डदान आदि कर्म करें। उसे अश्रुपात नहीं करना चाहिए। क्योंकि बान्धवों के द्वारा किये गये अश्रुपात और श्लेष्मपात को विवश होकर (पितारूपी) प्रेत पान करता है इसलिए इस समय निरर्थक शोक करके रोना नहीं चाहिए। यदि मनुष्य हजारों वर्ष रात-दिन शोक करता रहे, तो भी प्राणी कहीं भी दिखाई नहीं पड़ सकता। जिसकी उत्पत्ति हुई है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है और जिसकी मृ्त्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए बुद्धिमान को इस अवश्यम्भावी जन्म-मृत्यु के विषय में शोक नहीं करना चाहिए। ऎसा कोई दैवी अथवा मानवीय उपाय नहीं है, जिसके द्वारा मृत्यु...

श्री गरुड़ पुराण दसवां अध्याय

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 श्री गरुड़ पुराण दसवां अध्याय मृत्यु के अनन्तर के कृत्य, शव आदि नाम वाले छ्: पिण्ड दानों का फल, दाह संस्कार की विधि, पंचक में दाह का निषेध, दाह के अनन्तर किये जाने वाले कृत्य, शिशु आदि की अन्त्येष्टि का विधान   गरुड़ उवाच गरुड़ जी बोले –  हे विभो ! अब आप पुण्यात्मा पुरुषों के शरीर के दाह संस्कार का विधान बतलाइए और यदि पत्नी सती हो तो उसकी महिमा का भी वर्णन कीजिए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा –  हे तार्क्ष्य ! जिन और्ध्वदैहिक  कृत्यों को करने से पुत्र और पौत्र, पितृ-ऋण से मुक्त हो जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। बहुत-से दान देने से क्या लाभ? माता-पिता की अन्त्येष्टि क्रिया भली-भाँति करें, उससे पुत्र को अग्निष्टोम याग के समान फल प्राप्त हो जाता है। माता-पिता की मृत्यु होने पर पुत्र को शोक का परित्याग करके सभी पापों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए समस्त बान्धवों के साथ मुण्डन कराना चाहिए। माता-पिता के मरने पर जिसने मुण्डन नहीं कराया, वह संसार सागर को तारने वाला पुत्र कैसे समझा जाए? अत: नख और काँख को छोड़कर मुण्डन कराना आवश्यक है। इसके बाद समस्त ब...

श्री गरुड़ पुराण जी का नौवा अध्याय

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श्री गरुड़ पुराण जी का नौवा अध्याय     मरणासन्न व्यक्तियों के निमित्त किये जाने वाले कृत्य गरुड़ उवाच गरुड़जी बोले –  हे प्रभो! आपने आतुरकालिक दान के संदर्भ में भली भाँति कहा। अब म्रियमाण (मरणासन्न) व्यक्ति के लिए जो कुछ करना चाहिए, उसे बताइए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा –  हे तार्क्ष्य ! जिस विधान से मनुष्य मरने पर सद्गति प्राप्त करते हैं, शरीर त्याग करने की उस विधि को मैं कहता हूँ, सुनो। कर्म के संबंध से जब प्राणी अपना शरीर छोड़ने लगता है तो उस समय तुलसी के समीप गोबर से एक मण्डल की रचना करनी चाहिए। वहाँ उस मण्डल के ऊपर तिल बिखेरकर कुशों को बिछाए, तदनन्तर उनके ऊपर श्वेत वस्त्र के आसन पर शालिग्राम शिला को स्थापित करें। जहाँ पाप, दोष और भय को हरण करने वाली शालग्राम-शिला विद्यमान है, उसके संनिधान में मरने से प्राणी की मुक्ति सुनिश्चित है। जहाँ जगत के ताप का हरण करने वाली तुलसी वृक्ष की छाया है, वहाँ मरने से सदैव मुक्ति ही होती है, जो मुक्ति दानादि कर्मों से दुर्लभ है। जिसके घर में तुलसी वृक्ष के लिए स्थान बना हुआ है, वह घर तीर्थ स्वरुप ही है, वहाँ...

श्री गरुड़ पुराण आठवां अध्याय

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  श्री गरुड़ पुराण आठवां अध्याय  गरुड. उवाच  गरुड़ जी ने कहा –   हे तार्क्ष्य ! मनुष्यों के हित की दृष्टि से आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। धार्मिक मनुष्य के लिए करने योग्य जो कृत्य हैं, वह सब कुछ मैं तुम्हें कहता हूँ। पुण्यात्मा व्यक्ति वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर अपने शरीर को व्याधिग्रस्त तथा ग्रहों की प्रतिकूलता को देखकर और प्राण वायु के नाद न सुनाई पड़ने पर अपने मरण का समय जानकर निर्भय हो जाए और आलस्य का परित्याग कर जाने-अनजाने किये गये पापों के विनाश के लिए प्रायश्चित का आचरण करे। जब आतुरकाल उपस्थित हो जाए तो स्नान करके शालग्राम स्वरुप भगवान विष्णु की पूजा कराए। गन्ध, पुष्प, कुंकुम, तुलसीदल, धूप, दीप तथा बहुत से मोदक आदि नैवेद्यों को समर्पित करके भगवान की अर्चा करे और विप्रों को दक्षिणा देकर नैवेद्य का ही भोजन कराएँ तथा अष्टाक्षर (ऊँ नमो नारायणाय) अथवा द्वादशाक्षर (ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्र का जप करें। भगवान विष्णु और शिव के नाम का स्मरण करें और सुनें, भगवान का नाम कानों से सुनाई पड़ने पर वह मनुष्य के पाप को नष्ट करता है। रोगी के समीप आकर ...

श्री गरुड़ पुराण सातवां अध्याय

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  श्री गरुड़ पुराण सातवां अध्याय  इस अध्याय में पुत्र की महिमा, दूसरे के द्वारा दिये गये पिण्डदान आदि से प्रेतत्व से मुक्ति की बात कही गई है – इस संदर्भ में राजा बभ्रुवाहन तथा एक प्रेत की कथा का वर्णन है।   सूत उवाच सूतजी ने कहा –  ऎसा सुनकर पीपल के पत्ते की भाँति काँपते हुए गरुड़जी ने प्राणियों के उपकार के लिए पुन: भगवान विष्णु से पूछा।   गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा –  हे स्वामिन ! किस उपाय से मनुष्य प्रमादवश अथवा जानकर पापकर्मों को करके भी यम की यातना को न प्राप्त हो, उसे कहिए। संसार रूपी सागर में डूबे हुए, दीन चित्तवाले, पाप से नष्ट बुद्धिवाले तथा विषयों के कारण दूषित आत्मा वाले मनुष्यों के उद्धार के लिये हे माधव! पुराणों में सुनिश्चित किये गये उपाय को बताइए, जिससे मनुष्य सद्गति प्राप्त कर सकें।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले –  हे तार्क्ष्य ! मनुष्यों के हित की कामना से तुमने अच्छी बात पूछी है। सावधान होकर सुनो, मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। हे खगेश्वर! मैंने इसके पहले पुत्ररहित और पापी मनुष्यों की यातना का वर्णन किया है। पुत्रवान त...

श्री गरुड़ पुराण छठा अध्याय

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श्री गरुड़ पुराण छठा अध्याय  गरुड़ उवाच  गरुड़ जी ने कहा –  हे केशव ! नरक से आया हुआ जीव माता के गर्भ में कैसे उत्पन्न होता है? वह गर्भवास आदि के दु:खों को जिस प्रकार भोगता है, वह सब भी मुझे बताइए। विष्णुरुवाच भगवान विष्णु ने कहा –  स्त्री और पुरुष के संयोग से जैसे मनुष्य की उत्पत्ति होती है, उसे मैं तुम्हें कहूँगा। ऋतुकाल के आरंभ के तीन दिनों तक इन्द्र को लगी ब्रह्महत्या का चतुर्थांश रजस्वला स्त्रियों में रहता है, उस ऋतुकाल के मध्य में किये गये गर्भाधान के फलस्वरुप पापात्माओं के देह की उत्पत्ति होती है। रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी (धोबिन) कहलाती है। नरक से आए हुए प्राणियों की ये तीन माताएँ होती हैं। दैव की प्रेरणा से कर्मानुरोधी शरीर प्राप्त करने के लिये प्राणि पुरुष के वीर्य का आश्रय लेकर स्त्री के उदर में प्रविष्ट होता है। एक रात्रि में वह शुक्राणु कलल के रूप में, पाँच रात्रि में बुदबुद के रूप में, दस दिनों में बेर के समान तथा उसके पश्चात मांस पेशियों से युक्त अण्डाकार हो जाता है। एक मास में सिर, दो मास...

श्री गरूण पुराण - पंचम अध्याय

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    श्री   गरूण पुराण - पंचम अध्याय    गरुड़ उवाच     गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! जिस- जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियों में जीव जाते हैं, वह मुझे बताइए। श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – नरक से आये हुए पापी जिन पापों के द्वारा जिस योनि में आते हैं और जिस पाप से जो चिह्न होता है, वह मुझसे सुनो। ब्रह्महत्यारा क्षय रोगी होता है, गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है। कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी होता है और ये तीनों पापी चाण्डाल योनि प्राप्त करते हैं. स्त्री की हत्या करने वाला तथा गर्भपात कराने वाला पुलिन्द(भिल्ल) होकर रोगी होता है। परस्त्रीगमन करने वाला नपुंसक और गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला चर्म रोगी होता है। मांस का भोजन करने वाले का अंग अत्यन्त लाल होता है, मद्य पीने वाले के दाँत काले होते हैं, लालचवश अभक्ष्य भक्षण करने वाले ब्राह्मण को महोदर रोग होता है। जो दूसरे को दिये बिना मिष्टान्न खाता है, उसे गले में गण्डमाला रोग होता है, श्राद्ध में अपवित्र अन्न देने वाला श्वेतकुष्ठी होता है। गर्व स...

श्री गरुड़ पुराण चतुर्थ अध्याय

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श्री गरुड़ पुराण चतुर्थ अध्याय  गरुड़ उवाच  गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! किन पापों के कारण पापी मनुष्य यमलोक के महामार्ग में जाते हैं और किन पापों से वैतरणी में गिरते हैं तथा किन पापों के कारण नरक में जाते हैं? वह मुझे बताइए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले – सदा पापकर्मों में लगे हुए, शुभ कर्म से विमुख प्राणी एक नरक से दूसरे नरक को, एक दु:ख के बाद दूसरे दु:ख को तथा एक भय के बाद दूसरे भय को प्राप्त होते हैं। धार्मिक जन धर्मराजपुर में तीन दिशाओं में स्थित द्वारों से जाते हैं और पापी पुरुष दक्षिण-द्वार के मार्ग से ही वहाँ जाते हैं। इसी महादु:खदायी दक्षिण मार्ग में वैतरणी नदी है, उसमें जो पापी पुरुष जाते हैं, उन्हें मैं तुम्हें बताता हूँ – जो ब्राह्मणों की हत्या करने वाले, सुरापान करने वाले, गोघाती, बाल हत्यारे, स्त्री की हत्या करने वाले, गर्भपात करने वाले और गुप्तरूप से पाप करने वाले हैं, जो गुरु के धन को हरण करने वाले, देवता अथवा ब्राह्मण का धन हरण करने वाले, स्त्रीद्रव्यहारी, बालद्रव्यहारी हैं, जो ऋण लेकर उसे न लौटानेवाले, धरोहर का अपहरण करने वाले, विश्वासघात कर...